Monday, August 2, 2021
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बहुत यात्रा करते हैं तो दूसरी भाषाओं को भी ध्यान से सुनें और समझें, वर्ना हो सकता है नुकसान

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  • Aaj Ka Jeevan Mantra By Pandit Vijayshankar Mehta, Story Of Sardar Patel And Acharya Vinoba Bhave, Prerak Prasang, Motivational Story

कहानी – सरदार पटेल और आचार्य विनोबा भावे आश्रम में एक साथ भोजन करने बैठे थे। आश्रम में भोजन बनाने वाला व्यक्ति उत्तर प्रदेश का था। उसने खाना बनाने से पहले अपनी लोक भाषा में सरदार पटेल से पूछा, ‘आप पक्की रसोई पसंद करेंगे या कच्ची?’

रसोइए की स्थानीय भाषा में कच्ची रसोई यानी एकदम सादा भोजन, मूंग की दाल, रोटी आदि। पक्की रसोई यानी साग, पूड़ी और तले-गले पकवान।

आश्रम में सभी जानते थे कि सरदार पटेल थोड़े सख्त स्वभाव के हैं और अनुशासन प्रिय हैं। इस वजह से सभी उनका अतिरिक्त ध्यान रख रहे थे, लेकिन रसोइए ने पूछ लिया। पटेल ने अपने तेवर में उत्तर दिया, ‘पक्का ही खाएंगे, कच्चा क्यों खाएंगे। हम तो हर काम पक्का ही करते हैं।’

रसोइए ने भोजन बना दिया। जब सरदार पटेल के सामने थाली आई तो उसमें तला-गला खाना था। खाना देखकर पटेल बोले, ‘हम तो तला-गला खाना खाते नहीं हैं।’ तब उन्हें पता लगा कि कच्ची रसोई और पक्की रसोई का क्या मतलब है।

उन्होंने विनोबा को देखा तो विनोबा ने मुस्कान के साथ कहा, ‘रसोई का तो सुधार हो जाएगा, लेकिन हमें एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए, हमें बहुत अधिक यात्राएं करनी होती हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में जाना पड़ता है, ऐसे में हमें स्थानीय भाषाओं को ठीक से सुनना और समझना चाहिए। ये तो भोजन का मामला था, वर्ना कोई और बात होती तो अर्थ का अनर्थ हो जाता।’

सीख – भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। स्थानीय भाषाओं के शब्द और उनके अर्थ भी अलग-अलग होते हैं। जिन लोगों को यात्राएं करनी पड़ती हैं, उन्हें स्थानीय भाषाओं को ठीक से सुनना चाहिए और समझना चाहिए। खास तौर पर सेवकों की बात ठीक से सुनें, समझें और इसके बाद ही कोई आदेश देना चाहिए।

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