Thursday, July 22, 2021
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बोले- चाचा ने पीठ पर वार किया; केंद्र में मंत्री और पार्टी अध्यक्ष बनने की इच्छा बता देते तो मैं खुद पद छोड़ देता

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लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) में बगावत के बीच चिराग पासवान ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। उन्होंने बागी हुए अपने चाचा पशुपति पारस के साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी निशाना साधा है। चिराग का कहना है कि जो कार्यकर्ता रामविलास पासवान के विचारों का समर्थन करेगा, वो कभी भी नीतीश कुमार के साथ खड़ा नहीं होगा। नीतीश कुमार वो व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीतिक तौर पर रामविलास पासवान को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

चिराग का कहना है, ‘मेरी लड़ाई केवल मेरे पिता की विचारधारा को जीवित रखने की है। मेरे चाचा (पशुपति पारस) ने पीठ पर वार किया है और मेरे पिता को धोखा दिया है। मैं इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार हूं।’

पढ़िए दैनिक भास्कर से चिराग पासवान की पूरी बातचीत…

भास्कर: आपके चाचा का कहना है चिराग आशीर्वाद यात्रा निकाल रहा है तो हम भी 5 जुलाई को पटना में कार्यक्रम कर रहे हैं और उसकी यात्रा से ज्यादा भीड़ जुटाएंगे?

चिराग: आपको बता दूं कि बिहार में कोरोना प्रोटोकॉल लागू है। एक जगह पर भीड़ नहीं करने की बजाय लंबे रास्ते से होते हुए मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलते हुए जाना चाहता हूं, जो भी व्यक्ति रामविलास पासवान के विचारों का समर्थन करेगा। वो कभी भी नीतीश कुमार के साथ खड़ा नहीं होगा।

नीतीश कुमार वो व्यक्ति हैं जिन्होंने राजनीतिक तौर पर रामविलास पासवान को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने 2005 में हमारे विधायकों को तोड़ने की बात की। हमारे MLC को भी तोड़ा। फिर 2020 में हमारे एक विधायक को भी तोड़ा। अब हमारे पांच सांसदों को तोड़ने की घटना हुई है। राजनीतिक तौर पर रामविलास पासवान का कद किस तरह नीचा किया जाए, इसके लिए दलित-महादलित को लेकर आए और पासवान जी की विचारधारा को खत्म करने की कोशिश की।

अब मेरे चाचा नीतीश कुमार के साथ खड़े होकर मेरे पिताजी के विचारों की दुहाई देते हैं। वो ऐसा करके मेरे पिताजी को ही धोखा दे रहे हैं। मेरे चाचा ने परिवार और पार्टी को तोड़ा है। ऐसा करने से मेरे पिता की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। मेरे पिता का देहांत हो गया। मेरे छोटे चाचा का भी निधन हो गया। ऐसे में मेरे पिता तुल्य चाचा पारस ही थे। मैं इन्हीं के मार्गदर्शन में चलना चाहता था। लेकिन उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर से हटा लिया। मेरी लड़ाई केवल मेरे पिता की विचारधारा को जीवित रखने की है।

भास्कर: आपके चाचा पारस खुद को और अपने सांसदों को पांडव बता रहे हैं तो ऐसे में कौरव कौन हैं?

चिराग: ऐसी बातों से मेरा दिल दुखता है। मेरे पिता ने पूरी उम्र परिवारवाद का तंज भी झेला और परिवार को एकजुट रखने की कोशिश की। अब ये जिम्मेदारी मेरे चाचा की थी। लेकिन अब ये कौरव-पांडवों का खेल खेल रहे हैं। जब मैं बाहर लड़ाई लड़ रहा था तो मुझे मुझे नहीं पता था कि मेरे घर में भी एक लड़ाई लड़नी पड़ेगी। मेरे चाचा ने मेरी पीठ पीछे वार किया है। मैं इस बात से दुखी हूं।

भास्कर: अब कानून के मुताबिक LJP की कमान किसके हाथों में है?

चिराग: मैंने लोकसभा स्पीकर से मुलाकात कर मौखिक और लिखित रूप में कहा है कि ये उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है। मेरी पार्टी का नेता सदन में कौन होगा, यह स्पीकर तय नहीं करेगा। पार्टी का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि सदन के नेता को पार्टी का संसदीय बोर्ड ही चुनेगा। जब मेरा चयन किया गया था, तब भी ऐसा ही हुआ था।

पार्टी ही लीडर्स को चुनती है, सांसद नहीं। हमारे केंद्रीय बोर्ड के 75 लोगों में से 66 लोगों के एफिडेविट मेरे पास हैं। अगर अध्यक्षों की बात करें तो कुल 35 हैं, उनमें से 33 मेरे साथ हैं। मुझे कानूनी लड़ाई लड़नी भी पड़ी तो मैं पूरी तरह से तैयार हूं।

भास्कर: क्या आपको कभी लगा कि आपके चाचा ऐसा कर सकते हैं?

चिराग: मुझे दुख तो इसी बात का है कि जब मैं बुरे वक्त से गुजर रहा था। पिता के देहांत से सदमे में था। इसके बावजूद मेरे चाचा ने पिता जी के देहांत का एक साल भी पूरा नहीं होने दिया और मेरी पीठ पर वार किया है। अगर पारस चाचा को मंत्री ही बनना था तो मैं उनके नाम का प्रस्ताव करता हूं कि मोदी जी अगर आपको लोक जनशक्ति पार्टी से मंत्री बनाना है तो आप पशुपति पारस को बना दें। अगर इन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना था तो भी ये प्रस्ताव राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने रख सकते थे। एक बार वो मुझे बताते तो सही।

भास्कर: आपके चाचा का आरोप है कि उन्होंने ही आपको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था और आप आज उन पर ही उंगलियां उठा रहे हैं?

चिराग: चाचा ने चुनाव आयोग में लिखकर दिया है कि रामविलास पासवान के निधन के बाद ये पद खाली था। इसलिए इस पर चुनाव होना जरूरी था। उन्होंने चुनाव करते हुए खुद को ही राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया। ये सही कह रहे हैं कि मेरा प्रस्ताव उन्होंने 2019 में किया था और चुनाव आयोग में सूचना दी थी। पार्टी के संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद 5 साल के लिए होता है। बीच में ये दो शर्तों पर बदला जाता है। स्वयं अध्यक्ष अपने पद से त्यागपत्र दे या उनका निधन हो जाए। ऐसी क्या बात थी कि उन्होंने अपने चुनाव की खुद ही घोषणा करके वो खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए?

भास्कर: पशुपति पारस ने आरोप लगाया है कि चिराग जानबूझकर मेरे घर तब गए, जब मैं घर पर नहीं था। वो ऐसा करके मीडिया में आना चाहते हैं?

चिराग: मेरी जहां तक जानकारी है कि लोकसभा स्पीकर से उनकी मुलाकात मेरे घर जाने से एक दिन पहले ही हो गई थी। वो सही जानकारी नहीं दे रहे हैं। वे ओम बिड़ला से मिलने गए थे। मैंने घंटों दरवाजे पर और घंटों घर के अंदर बैठकर इंतजार किया। अगर वे वास्तव में कहीं गए भी थे, तो एक बार फोन ही कर देते। कुछ लोग तो कहते हैं कि मेरे पिता की मौत के बाद से मेरी पारस चाचा से कोई बात नहीं हुई है। उन्होंने पिताजी के जाने के बाद हमारे परिवार से बातचीत बंद कर दी है।

भास्कर: पारस ने कहा है कि जो बनारस के सौरभ पांडेय आपके साथ हैं, उन्हीं की वजह से परिवार टूटा है, क्या ये सच है?

चिराग- कोई भी व्यक्ति पार्टी को तोड़ने नहीं आया है। चाचा को किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए। एक आदमी से पार्टी नहीं चलती। वो लोकतंत्र से चलती है। आज के दिन पूरी पार्टी मेरे साथ खड़ी है। विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला सभी बड़े नेताओं ने लिया था। उस बैठक में चाचा भी शामिल थे। उनकी सहमति थी कि हम अकेले ही लड़ेंगे और रामविलास पासवान भी कभी नहीं चाहते थे कि हम नीतीश कुमार के साथ मिलकर चुनाव लड़ें।

हमारी 6 सांसदों वाली पार्टी केवल 15 सीटों पर विधानसभा का चुनाव लड़े, ये सही नहीं था। अगर मुझे रेड कारपेट पर चलना होता तो मेरे लिए आसान होता और आज दो मंत्री मेरे बिहार में जरूर होते। मैं अपने पिताजी की जगह केंद्र में मंत्री होता। मैंने संघर्ष का रास्ता इसलिए चुना है ताकि मेरे पिताजी की विचारधारा जीवित रहे।

भास्कर: आपको प्रधानमंत्री मोदी से क्या उम्मीद है?

चिराग: मेरा विश्वास देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर है और मैं खुद को उनका हनुमान मानता हूं। मैं तमाम मुद्दों पर प्रधानमंत्री के साथ खड़ा हूं, चाहे वो धारा 370 हो, तीन तलाक हो या राम मंदिर हो। मैं सभी पर उनका समर्थन करता हूं। नीतीश कुमार हमेशा से खिलाफ ही रहे हैं और उन्होंने CAA को लेकर तो बिहार विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर दिया था। केंद्र सरकार सीएए को दोबारा से लागू करना चाहेगी तो नीतीश कुमार फिर से इनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे। मोदी जी ने जब प्रधानमंत्री की दावेदारी की थी, तब उनके साथ लोक जनशक्ति पार्टी खड़ी थी। हाथ छोड़कर भागने वालों में नीतीश कुमार पहले व्यक्ति थे।

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