Monday, July 19, 2021
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एस्ट्राजेनेका ने भारत के फैसले का समर्थन किया; कहा- वैक्सीन का दूसरा डोज दूसरे या तीसरे महीने लगे तो ज्यादा सुरक्षा देगा

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प्रोफेसर पोलार्ड ने कहा- ने कहा कि वैक्सीन की किल्लत की स्थिति में कम संख्या में लोगों की बेहतर सुरक्षा की बजाय अधिक से अधिक लोगों के लिए सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। - Dainik Bhaskar

प्रोफेसर पोलार्ड ने कहा- ने कहा कि वैक्सीन की किल्लत की स्थिति में कम संख्या में लोगों की बेहतर सुरक्षा की बजाय अधिक से अधिक लोगों के लिए सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

देश में कोरोना वैक्सीन कोवीशील्ड के दो डोज के बीच गैप बढ़ाने के सरकार के फैसला का ब्रिटिश फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने भी समर्थन किया है। एस्ट्राजेनका-ऑक्सफोर्ड ने ही इस वैक्सीन का फॉर्मूला तैयार किया है, जबकि सीरम इंस्टीट्यूट इसे भारत में कोवीशील्ड नाम से बना रहा है। एस्ट्राजेनका के क्लिनिकल ट्रायल के मुख्य जांचकर्ता प्रो. एंड्रयू पोलार्ड ने शुक्रवार को कहा कि वैक्सीन सिंगल डोज के बाद दूसरे और तीसरे महीने में ज्यादा सुरक्षा प्रदान करती है, यानी इसका सुरक्षा का स्तर और भी बढ़ जाता है। ऐसे में डोज का गैप बढ़ाने के फैसले में कोई कमी नजर नहीं आती।

3 पॉइंट में समझें भारत का फैसला सही क्यों?

  1. पोलार्ड ने शुक्रवार को एक इंटरव्यू में ब्रिटेन में एस्ट्राजेनेका की दो डोज के बीच का अंतर कम करने और भारत में इसे बढ़ाने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन ने ऐसे समय में दो डोज के गैप को कम किया गया, जब उसकी आबादी के एक बड़े हिस्से का वैक्सीनेशन हो चुका था।
  2. ऐसे में दोनों देशों की वैक्सीनेशन पॉलिसी की तुलना नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि दोनों देशों में अलग-अलग परिस्थितियों के कारण अलग-अलग फैसले लिए।
  3. भारत में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए साफ समझ में आता है कि वह जल्द से जल्द अधिक संख्या में लोगों को वैक्सीन की कम से कम एक डोज देने के बारे में सोच रहा है, जो कि सही फैसला है।

एस्ट्राजेनेका सिंगल डोज वैक्सीन पर काम नहीं कर रही
ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पीडियाट्रीशियन और संक्रमण से होने वाली बीमारियों के विभाग के प्रोफेसर पोलार्ड ने कहा कि एस्ट्राजेनेका सिंगल डोज वैक्सीन पर काम नहीं कर रहा है। हमारा ग्रुप बूस्टर डोज पर भी काम नहीं कर रहा। उन्होंने कहा कि वैक्सीन की किल्लत की स्थिति में कम संख्या में लोगों की बेहतर सुरक्षा की बजाय अधिक से अधिक लोगों के लिए सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

वैज्ञानिक आधार पर लिया फैसला
इससे पहले कोविड वर्किंग ग्रुप के चीफ डॉ. एनके अरोड़ा ने भी फैसले को वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर सही बताया था। कोवीशील्ड के दो डोज का अंतर बढ़ाए जाने के बाद से चल रही बहस के बीच उन्होंने कहा था कि इस वैक्सीन का सिंगल डोज कोरोना के डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ 61% तक कारगर है। इसी वैरिएंट की वजह से देश में कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक हुई थी। दोनों डोज के गैप को कम करने की बात पर उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे नए डेटा उपलब्ध होते जाएंगे, हम इसको रिव्यू करेंगे और सही फैसला लेंगे।

कोवीशील्ड के डोज का गैप बढ़ाने के लिए डॉ. अरोड़ा के तर्क

  • भारत में जब वैक्सीन डोज के बीच गैप तय करना था, तब हमें इस आंकड़े की जानकारी नहीं थी। हमने अपने परीक्षण डेटा के आधार पर 4 सप्ताह का गैप तय किया, जिससे अच्छे रिजल्ट मिले। बाद में ज्यादा वैज्ञानिक और प्रयोगशाला संबंधी आंकड़ों के आधार पर इसमें बदलाव किए गए।
  • ब्रिटेन की पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) ने अप्रैल के अंतिम हफ्ते में आंकड़े जारी कर बताया था कि वैक्सीन के दोनों डोज के बीच 12 हफ्ते का गैप होने पर इसका असर 65% से 88% के बीच रहता है। इसी वजह से ब्रिटेन अल्फा वैरिएंट के कहर से बाहर आ सका। वहां टीके की खुराकों के बीच अंतर 12 हफ्ते रखा गया था।
  • हमें भी लगा कि यह एक अच्छा आइडिया है और इस बात के बुनियादी वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं कि गैप बढ़ाने पर एडेनोवेक्टर टीके बेहतर रिजल्ट देते हैं। इसलिए टीके की खुराकों के बीच अंतराल बढ़ाकर 12 से 16 हफ्ते करने का 13 मई को फैसला किया गया।

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