Monday, August 2, 2021
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रेड मीट इंसान का DNA डैमेज करके कोलोन कैंसर का रिस्क बढ़ाता है, इसमें मौजूद नाइट्रेट केमिकल भी है खतरनाक

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पिछले कई सालों से डॉक्टर्स लोगों को रेड मीट कम से कम खाने की सलाह देते आ रहे हैं क्योंकि ऐसा खानपान कोलोन कैंसर का खतरा बढ़ाता है। रेड मीट का कैंसर से क्या कनेक्शन है, इसे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में समझाया है। वैज्ञानिकों का कहना है, रेड मीट इंसान के डीएनए को डैमेज करता है और कैंसर का खतरा बढ़ाता है। यह एक कार्सिनोजेनिक फूड है यानी ऐसा खानपान जो कैंसर की वजह बन सकता है।

कैंसर के 900 मरीजों पर रिसर्च की
शोधकर्ता और डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के एक्सपर्ट मारियोज गियानेकिस कहते हैं, हमने टीम के साथ मिलकर कोलोन कैंसर से जूझने वाले 900 मरीजों पर रिसर्च की। इनके DNA की जांच की।

रिपोर्ट कहती है, इन मरीजों के DNA में ऐसा बदलाव दिखा जो पहले कभी नहीं देखा गया था। यह बदलाव साबित करता है कि DNA डैमेज हुआ है। शरीर की सभी कोशिकाओं में यह बदलाव नहीं हुआ लेकिन कोलोन से लिए गए सैम्पल में इसे देखा गया। वैज्ञानिकों का कहना है, रेड मीट में नाइट्रेट जैसे केमिकल पाए जाते हैं, जो कैंसर की वजह बन सकते हैं।

इससे पहले भी रिसर्च में साबित हो चुका है कि स्मोकिंग की आदत और अल्ट्रावायलेट किरणें इंसान के जीन पर बुरा असर डालती हैं। नतीजा, कैंसर का खतरा बढ़ता है। कोशिकाएं कंट्रोल से बाहर होने लगती हैं और अपनी संख्या को बढ़ाती हैं।

क्या है कोलोन कैंसर
इसे कोलोरेक्टल कैंसर और बड़ी आंत का कैंसर भी कहते हैं। ये कैंसर बड़ी आंत (कोलोन) या रेक्टम (गैस्ट्रो इंटस्टाइनल का अंतिम भाग) में होता है। इस कैंसर में पेट से जुड़ी कई प्रॉब्लम्स जैसे इरिटेबल बाउल सिंड्रोम और कब्ज की समस्या होती है।

ये लक्षण दिखने पर अलर्ट हो जाएं

कैंसर इंडिया के मुताबिक, अगर आपको इनमें से कोई भी परेशानी नजर आ रही है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

  • लगातार कब्ज या दस्त बने रहना, पेट पूरी तरह से साफ नहीं होने का अहसास या मल का आकार बदलना समेत बाउल हैबिट्स में बदलाव आना।
  • मल में या मल के ऊपर खून के काले धब्बे होना।
  • पेट में ऐंठन, सूजन, गैस या दर्द का बने रहना।
  • बिना वजह थकान, कमजोरी, भूख में कमी या वजन कम होना।
  • पेल्विक एरिया में दर्द होना। यह दर्द बीमारी की बाद की स्टेज में होता है।

50 साल से अधिक उम्र वालों को खतरा

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, यह कैंसर महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह 50 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों में पाया जाता है।

अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर को रोकने का सबसे अच्छा तरीका रेग्युलर स्क्रीनिंग है। स्क्रीनिंग प्रक्रिया के तहत लोगों में कैंसर की जानकारी का पता तब भी लगाया जा सकता है कि जब उन्हें लक्षण नजर नहीं आ रहे हों।

आमतौर पर स्क्रीनिंग शुरू में कोलोरेक्टल कैंसर का पता लगा सकती है। एक पॉलिप को कैंसर बनने के लिए 10 से 15 साल का वक्त लगता है। स्क्रीनिंग के जरिए डॉक्टर पॉलिप्स को कैंसर में बदलने और बढ़ने से पहले उनका पता कर शरीर से निकाल सकते हैं।

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