Friday, July 30, 2021
Homeदुनिया4 कैंडिडेट दौड़ में, पिछली बार हारे 60 साल के कट्टरपंथी इब्राहिम...

4 कैंडिडेट दौड़ में, पिछली बार हारे 60 साल के कट्टरपंथी इब्राहिम रईसी सबसे आगे; एटमी प्रोग्राम जारी रखने के हिमायती

ईरान में आज राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। कुल चार कैंडिडेट मैदान में हैं। इनमें 60 साल के धर्मगुरु और चीफ जस्टिस इब्राहिम रईसी का पलड़ा भारी माना जा रहा है। नए राष्ट्रपति का कार्यकाल अगस्त में शुरू होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रईसी की जीत लगभग तय है। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका और पश्चिमी देशों से ईरान का टकराव बढ़ेगा, क्योंकि रईसी एटमी प्रोग्राम जारी रखने के हिमायती हैं। दूसरी तरफ, रईसी जीते तो ईरान-चीन में करीबी बढ़ेगी। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर ईरान में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं है। इसकी एक वजह कोविड-19 भी है। हाल ही में ईरान ने अपनी ‘कोवईरान’ वैक्सीन बनाने का दावा भी किया है।

इस बार रूहानी मैदान में क्यों नहीं?
ईरान के संविधान के मुताबिक, एक व्यक्ति दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति पद पर नहीं रह सकता। हसन रूहानी दो बार में अपना 8 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। लिहाजा, वो राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते।

इस बार कितने उम्मीदवार?
कुल 4 उम्मीदवार मैदान में हैं। हालांकि गार्जियन काउंसिल ने 7 उम्मीदवारों के नाम शॉटलिस्ट किए थे। 3 उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिए। ये भी दिलचस्प है। उदारवादी धड़े से ताल्लुक रखने वाले मोहसिन मेहर अलीजाद ने तो चुनाव के दो दिन पहले यानी 16 जून को नाम वापस लिया। वैसे भी उनके जीतने की उम्मीद न के बराबर थी। एक और प्रत्याशी अलीरजा जकानी ने भी नाम वापस ले लिया है। इनके अलावा सईद जलीली ने भी नाम वापस लिया है।

जकानी भी कट्टरपंथी हैं और माना ये जा रहा है कि उन्होंने नाम इसलिए वापस लिया ताकि इब्राहिम रईसी की जीत की राह में कोई दिक्कत न हो। कहा ये भी जा रहा है कि जकानी पर नाम वापस लेने के लिए दबाव डाला गया। इसी तरह जलीली भी कट्टरपंथी ही माने जाते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच 2015 में हुई न्यूक्लियर डील का वो हिस्सा रहे हैं। रईसी को मजबूत करने के लिए ही ऐन वक्त पर जलीली भी पीछे हटे हैं।

ये हैं चार कैंडिडेट्स

  • इब्राहिम रईसी : चीफ जस्टिस भी हैं
  • मोहसिन रेजाई : सेना के पूर्व कमांडर इन चीफ हैं
  • अब्दुलनस्र : सेंट्रल बैंक के पूर्व चीफ
  • आमिर हुसैन हाशमी : संसद के डिप्टी स्पीकर

चुनाव या औपचारिकता
माना जा रहा कि वोटिंग का प्रतिशत कुछ भी रहे, लेकिन इब्राहिम रईसी की जीत तय है। इसकी तीन वजहें प्रमुख हैं। पहली- उन्हें कट्टरपंथी धड़े, गार्जियन काउंसिल और सर्वोच्च धर्मगुरु का समर्थन हासिल है। दूसरी- अमेरिका और पश्चिमी देशों के सामने कभी न झुकने की बात करते हैं। तीसरी- ईरान की इकोनॉमी के लिए आत्मनिर्भर कार्यक्रम लाने की बात करते हैं। एक वजह यह भी है कि उदारवादी और सुधारवादी उम्मीदवारों के खिलाफ माहौल बना दिया गया। जो कट्टरपंथी रईसी को चुनौती दे रहे थे, उन्होंने भी नाम वापस ले लिए। रईसी 2017 के चुनाव में हसन रूहानी से हार गए थे। सेना (रिवोल्यूशनरी गार्ड्स) भी इनके साथ है।

क्या हैं प्रमुख मुद्दे?

  • अर्थव्यवस्था : 2015 में ओबामा के दौर में अमेरिका से न्यूक्लियर प्रोग्राम पर डील हुई। 2018 में ट्रम्प ने इसे रद्द कर दिया। ईरान की इकोनॉमी चरमरा गई।
  • बेरोजगारी : पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मुल्क में 24% युवा बेरोजगार हैं। प्रतिबंधों के चलते वे दूसरे देशों में नहीं जा पाते।
  • लोकतंत्र : ईरान में सही मायनो में लोकतंत्र नहीं है। राष्ट्रपति भी गार्जियन काउंसिल की ही बात मानता है। ज्यादातर मामले सर्वोच्च धर्मगुरु तय करता है।
  • कोरोना : 3 करोड़ से ज्यादा मामले दर्ज, करीब 83 हजार संक्रमितों की मौत। देश में बनी वैक्सीन तैयार, लेकिन लोग वैक्सीनेशन के लिए ज्यादा तैयार नहीं।
  • डिप्लोमेसी : किसी भी पड़ोसी देश से अच्छे रिश्ते नहीं। यही वजह है कि ईरान दुनिया में अलग-थलग पड़ा।
  • आतंकवाद : फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास को मदद देने का आरोप। इसीलिए हमेशा इजराइल और अमेरिका के निशाने पर।

भारत से रिश्ते और अमेरिका-चीन कनेक्शन

  • ऐतिहासिक तौर पर भारत और ईरान के रिश्ते अच्छे रहे हैं। 2017 तक तो भारत ईरान से काफी कारोबार और तेल आयात करता था। ट्रम्प ने जब ईरान पर बेहद सख्त प्रतिबंध लगाए तो इसका असर दोनों देशों के रिश्तों पर पड़ा। भारत ने 2003 में यहां चाबहार बंदरगाह और रेल लाइन प्रोजेक्ट शुरू किया था। ईरान पर लगे प्रतिबंधों का इस पर काफी असर हुआ और काम धीमा हो गया। रेल लाइन प्रोजेक्ट तो अब ठंडे बस्ते में है, लेकिन पोर्ट भारत के जिम्मे है।
  • भारत-अमेरिका की दोस्ती ईरान को रास नहीं आ रही। चीन ने इसका फायदा उठाया और 25 साल के लिए ईरान से 400 अरब डॉलर का एक आर्थिक समझौता किया। भारत के लिए यह झटका जरूर है, लेकिन उसे सऊदी अरब, यूएई (बाकी खाड़ी देश भी), अमेरिका, यूरोप को ध्यान में रखकर फैसले लेने हैं। ईरान तो अकेला है।
  • ईरान में हमेशा से कट्टरपंथी सरकार रही है। एटमी प्रोग्राम के चलते वो अलग-थलग पड़ गया। अगर बाइडेन ईरान से फिर एटमी डील करते हैं तो मुमकिन है कि भारत और ईरान के बीच गर्मजोशी के रिश्ते बहाल हो जाएं। माना जा रहा है कि चीन को रोकने के लिए अमेरिका फिर एटमी डील कर सकता है।

ईरान की शासन व्यवस्था

  • संसद : 290 सदस्य होते हैं, मजलिस भी कहा जाता है।
  • न्यायपालिका : सुप्रीम कोर्ट कह सकते हैं, 6 सदस्य होते हैं।
  • गार्जियन काउंसिल : सबसे ताकतवर, 12 मेंबर होते हैं।
  • राष्ट्रपति : काउंसिल की सलाह पर काम करता है।
  • असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स : 88 सदस्य होते हैं, 8 साल में चुनाव।
  • विशेष समिति : 39 सदस्य होते हैं, विवादों का निपटारा करते हैं।
  • सुप्रीम लीडर : राष्ट्रपति से भी ज्यादा ताकतवर, सर्वोच्च धार्मिक गुरु होता है।

Source link

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments