Thursday, July 29, 2021
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महाभारत काल में भीम ने किया था ये व्रत इसलिए भीमसेनी एकादशी कहते हैं इसे

  • महाभारत, स्कंद और पद्म पुराण के मुताबिक इस व्रत से जाने-अनजाने में हुए कई जन्मों के पाप खत्म होते हैं

निर्जला एकादशी व्रत ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की ग्यारहवीं तिथि को किया जाता है। इस व्रत के दौरान सूर्योदय से लेकर अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक पानी नहीं पीने का विधान है। इस कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। ये 21 जून को किया जाएगा। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि महर्षि वेदव्यास के मुताबिक सबसे पहले इस व्रत को द्वापर युग में भीम ने किया था।

निर्जला एकादशी पर दान का महत्व
निर्जला एकादशी पर लोगों को पानी पिलाने और जल दान करने की परंपरा है। इस दिन अन्न, जल, तिल, कपड़े, आसन, जूता, छतरी, पंखा और फलों का दान करना चाहिए। साथ ही जल से भरे घड़े या कलश का दान करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।
इस दिन पानी और तिल का दान करने से पितर भी तृप्त हो जाते हैं। इस व्रत से बाकी सभी एकादशियों पर अन्न खाने का दोष भी खत्म हो जाता है और हर एकादशी व्रत का पुण्य भी मिलता है। श्रद्धा से जो इस एकादशी का व्रत करता है, वो हर तरह के पापों से मुक्त होता है।

व्रत का संकल्प और तीर्थ स्नान
एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर तीर्थ स्नान करना चाहिए। ऐसा न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा, दान और दिनभर व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए। इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक पानी नहीं पिया जाता और कुछ खाया भी नहीं जाता है।

पूजा-पाठ और दान
इस एकादशी व्रत में पीले कपड़े पहनकर पूजा की जाती है। ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र बोलते हुए भगवान विष्णु का अभिषेक किया जाता है। साथ ही भगवान विष्णु की पूजा में पीले फूल और पीली मिठाई खासतौर से शामिल की जाती है। फिर श्रद्धा और भक्ति से कथा सुनी जाती है। इसके बाद पानी से कलश भरकर उसे सफेद कपड़े से ढककर रखें। उस पर चीनी और दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान किया जाता है।

देवव्रत भी कहा जाता है निर्जला एकादशी को
एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं। भगवान विष्णु को ये तिथि प्रिय होने से इस दिन जप-तप, पूजा और दाना करने वाले भगवान विष्णु को प्राप्त करते हैं। जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। इस व्रत को देवव्रत भी कहा जाता है क्योंकि सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि अपनी रक्षा और श्रीविष्णु की कृपा पाने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं।

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