Thursday, July 29, 2021
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मूवी में फॉरेस्ट ऑफिसर बनीं विद्या बालन, बोलीं- यह फिल्म उस आम धारणा पर वार करती है, जो औरत के मर्दों वाले कामों पर सवाल उठाती है

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पिछले साल मैथ्‍स की जीनियस ‘शकुंतला देवी’ का रोल निभाने के बाद विद्या बालन अब ‘शेरनी’ में बतौर फॉरेस्‍ट ऑफिसर के रोल में नजर आएंगी। इस फिल्म को ‘न्‍यूटन’ फेम अमित मासुरकर ने डायरेक्‍ट किया है। यह फिल्म ओटीटी प्‍लेटफॉर्म एमेजॉन प्राइम पर ही रीलीज होगी। इस मौके पर विद्या बालन ने दैनिक भास्‍कर से खास बातचीत की और बताया कि यह फिल्म उस आम धारणा पर वार करती है कि औरत कैसे मर्दों वाले जॉब कर सकती है।

Q.ये किस तरह की ‘शेरनी’ है? बॉलीवुड की ‘शेरनी’ के पास ये फिल्म कब आई थी?
A.ये उस तरह की ‘शेरनी’ है, जो दहाड़ती, गुर्राती और गरजती नहीं, सीधा बरसती है। मुझे याद नहीं है, पर यह फिल्म शायद डेढ़ साल पहले मेरे पास आई थी। दो साल पहले जब अमित मासुरकर मेरे पास आए थे। तब उन्‍होंने कहा था ये स्‍टोरी आइडिया आप पहले सुनिए अगर अच्‍छा लगे तो फिर इसका स्‍क्रीनप्‍ले और डायलॉग लिखूंगा। हमने पहले भी साथ में कई ऐड फिल्‍म्‍स किए हैं।

Q.उनके आइडिया पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया रही?
A.मुझे वो आइडिया बहुत पसंद आया। हिंदी फिल्‍मों में जंगल बेस्‍ड कहानी कम होती हैं। अमित मासुरकर ने फिल्म ‘न्‍यूटन’ बनाई थी। वह जंगल में बेस्‍ड थी, मगर वह जंगल को लेकर नहीं थी। यह फिल्म जंगल को लेकर है। साथ ही अमित मासुरकर की कहानियों में इन्हेरेंट मैसेज भी होता है। वो एक यूनीक डायरेक्‍टर हैं। साथ ही मेरे पास जंगल की अनूठी दुनिया में काम करने का मौका भी था। ऐसे में, मैंने हामी भर दी।

Q.एक संदेश तो है कि आम जिंदगी में लोग फीमेल फॉरेस्‍ट अफसरों को एक्‍सेप्‍ट नहीं ही करते हैं?
A.सच कहूं तो सटायर ही अमित का जॉनर है। ये बहुत सारी चीजों पर रौशनी डालता है। यह फिल्म उस आम धारणा पर वार करती है कि औरत कैसे मर्दों वाले जॉब में यानी फॉरेस्‍ट अफसर कैसे बन सकती है। ऐसी नौकरियों में तो मर्द यानी मुस्‍टंडे होने चाहिए। पुलिस डिपार्टमेंट में तो फिर भी महिलाओं की मौजूदगी एक्‍सेप्‍ट की जाने लगी है, मगर फॉरेस्‍ट डिपार्टमेंट में अब भी बहुत कुछ होना बाकी है। यहां तक कि फॉरेस्‍ट डिपार्टमेंट को लेकर फिल्‍में भी बहुत कम ही बनी हैं। इस फिल्म में मेकर्स ने फीमेल फॉरेस्‍ट अफसरों के प्रति आम लोगों की धारणाओं को सामने रखा है।

Q.विद्युत जामवाल ने कहा था कि जंगली की शूटिंग के दौरान खास पैटर्न को फॉलो किया तो जानवरों के साथ शूट में प्रॉब्‍लम नहीं हुई। आप लोगों ने क्‍या तरीके यूज किए?
A.हमें फिल्म की शूटिंग के लिए एमपी टूरिज्‍म ने काफी मदद की। उन्‍होंने हमें काफी संसाधन मुहैया करवाए। वहां पर बस टायमिंग्स की रिस्‍ट्र‍िक्‍शंस थीं। आप जोर से चिल्‍ला नहीं सकते थे। आमतौर पर बाकी सेट पर शोर शराबा होता ही है। यहां सारे क्रू को बहुत सख्‍त निर्देश दिए गए थे और सभी ने उसका पालन किया। इस वजह से हम टाइम पर शूटिंग पूरी भी कर सके। शूटिंग के समय हमारा पाला जानवरों से नहीं पड़ा। हां, बस लंच टाइम पर न जाने कहां से बंदर आ जाया करते थे। एक सीन में हम लोग समोसे खा रहे थे। न जाने वहां पर कहां से बंदरों की टोली आ गई। हालां‍कि वो हमारे चले जाने का इंतजार करते रहे और शूट में उन्‍होंने खलल नहीं डाली। हमारे जाते ही उन्‍होंने सारे समोसे सफाचट कर दिए।

Q. आपका सेट पर आदिवासियों के साथ भी इंटरैक्‍शन हुआ?
A.आदिवासियों के साथ इंटरैक्‍शन तो नहीं हुआ। पर गांव वालों के साथ जरूर हुआ। उनकी समझ काफी निराली होती है। बड़े उत्‍साह के साथ वो बताया करते थे कि फलां कौन सा पत्‍ता है? ये जड़ी बूटी है, वो जहर है। अच्‍छा इस पेड़ पर निशान है। ये जरूर लेपर्ड के होंगे।

Q.आपको फिल्‍म इंडस्‍ट्री में किन मौकों पर जज किया गया?
A.हमेशा, यह इंसानी फितरत है एक-दूसरे को जज करना। आज भी औरतों को दोगुना जज किया जाता है। इसने कैसे कपड़े पहने हैं, लिपिस्टिक कम लगाई हैं, ये फॉरेस्‍ट ऑफिसर कैसे बन सकती है? दरअसल इस टॉपिक पर बात तो बहुत हो रही, मगर नतीजे कम ही आए हैं। अभी भी इस पर बहुत काम होना बाकी है।

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