Sunday, August 1, 2021
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पाकिस्तान से भोपाल आए परिवारों का मुसीबत भरा सफरनामा, 74 साल बाद भी जारी है इनका जिंदगी के लिए संघर्ष

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मुजफ्फराबाद से आईं अमृत कौर के - Dainik Bhaskar

मुजफ्फराबाद से आईं अमृत कौर के

वर्ल्ड रिफ्यूजी डे पर आज हम आपको बता रहे हैं भोपाल के रिफ्यूजी परिवारों की कहानी। अंतहीन संघर्ष के 74 साल बीत चुके हैं, लेकिन इनकी जिंदगी तो आज भी खतरे में ही है। 1947 में विभाजन के वक्त पाकिस्तान में रहना सुरक्षित नहीं था, यहीं सोचकर भारत आए थे। लेकिन इन परिवारों क्या मालूम था कि नई जगह सुरक्षित रह पाएंगे या नहीं?

हम बात कर रहे हैं पुनर्वास विभाग द्वारा सन् 1962 में भोपाल की गुरु नानक कॉलोनी में बसाए गए 67 परिवारों की। 2015 में यहां के एक घर का छज्जा गिरने के बाद PWD ने सभी मकानों को जर्जर घोषित कर दिया था। रिफ्यूजी परिवारों को यहां से हटने के लिए नोटिस थमा दिए गए। इनमें ज्यादातर परिवार तो दूसरी जगह किराये पर रहने चले गए, लेकिन 16 परिवार आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर यहां रह रहे हैं। चूंकि इनमें कई तो अपने भोजन के लिए भी दूसरों पर निर्भर हैं।

ऐसे में इनका सवाल है कि अफसरों ने मकानों को जर्जर बताकर हटने का नोटिस तो दे दिया, लेकिन जाएं कहां यह नहीं बताया। 1947 से अब तक यहां चार पीढ़ियां रह चुकी हैं। चौथी पीढ़ी के लोग तो बुजुर्गों के किस्से सुनकर आज भी सहम जाते हैं।

79 साल की अमृत कौर की कहानी…
बरसात के दिनों में खुले आसमान के नीचे बच्चों के साथ फुटपाथ पर गुजरे दिन याद करके आज भी रो देती हैं अमृत कौर। वे कहती हैं…ट्रेन से हमें भोपाल छोड़ने खुद चाचा नेहरू साथ आए थे, लेकिन यहां 4-4 दिन तक खाने को सूखी रोटी तक नहीं मिलती थी। पाकिस्तान में कश्मीर जिले के मुजफ्फराबाद में हमारा घर था। 1947 में बंटवारे के दौरान हमारे घरों में आग लगाई जाने लगी। बिरादरी के लोग अपनी जान बचाकर वहां से भागने लगे। दोनों तरफ नदी थी। जैसे-तैसे सेना के लोगों ने हमें वहां से सुरक्षित निकालकर हिमाचल के योल कैंप पहुंचाया।

अमृत कौर वृद्धावस्था पेंशन और सरकारी राशन के भरोसे गुजर-बसर कर रही हैं।

अमृत कौर वृद्धावस्था पेंशन और सरकारी राशन के भरोसे गुजर-बसर कर रही हैं।

पाकिस्तान में तो जहां देखो, वहां लाशों का ढेर था। करीब तीन साल बाद हमें ट्रेन से भोपाल लाया गया। मैदा मिल के पास हमें उतारा गया। उतरते ही आसपास ऐसे हालात थे, मानो दिन में ही शेर आ जाएगा। इतना खतरनाक इलाका था। पूरा जंगल था आसपास। हमारे साथ तो महिलाएं थीं, वो कहती थी, पाकिस्तान से तो बचकर आ गए, लेकिन यहां जंगल में कैसे बच पाएंगे। फिर हमें शाहजहानाबाद मिलिट्री ने कैंप में रखा। बड़े-बड़े टेंट थे। हमारी बिरादरी के हजारों लोग आए थे। लेकिन आसपास जानवरों का मांस बेचने वालों को देखकर बड़ी संख्या में लोगों ने भोपाल में रहना ठीक नहीं समझा।

इस दौर में हमने कई बड़ी-बड़ी मुसीबतें झेली हैं। खाने को सूखी रोटी तक नहीं मिलती थी। पाकिस्तान में हमारी ही कौम के MLA हरदित्त सिंह ने उस वक्त हमें बताया कि भोपाल राजधानी बनेगी, इसलिए यहां सेट होना ठीक रहेगा। इसके बाद फुटपाथ पर रहकर मेहनत-मजदूरी करके जैसे-तैसे अपने बच्चों को पाला। खुले आसपास में नीचे रहने को मजबूर थे। बरसात के दिनों में पानी से बचने के लिए यहां-वहां छुपते फिरते थे। इसके बाद धीरे-धीरे हालात सुधरे। सरकार से भी राशन मिलता रहा। सिंधी समाज के लोगों को भी इसी जगह ठहराया गया।

1962 में इसरानी मार्केट में क्वार्टर अलॉट किया, लेकिन मालिकाना हक आज तक नहीं दिया गया। यह क्वाटर्स भी दो साल पहले जर्जर घोषित किया जा चुका है। साल 2016 में रिफ्यूजी डे के दिन ही पति मेहताब सिंह का 82 साल की उम्र में देहांत हो गया। इसके बाद से मैं वृद्धावस्था पेंशन और सरकारी राशन के भरोसे गुजर-बसर कर रही हूं। 58 साल का बेटा अमरजीत सिंह मानसिक रोगी है। वह भी पेंशन के भरोसे अपना गुजारा चला रहे हैं।

ट्रेनों में मूंगफली बेची, फिर 4 स्कूल में प्रिंसिपल भी बने
विष्णु गेहाणी विभाजन के वक्त सिंध (पाकिस्तान) में अपना घर-द्वार सब छोड़ आए थे। 11 साल की उम्र में मां और छोटी बहन के साथ सबसे पहले जोधपुर पहुंचे थे। यहां मंडोर किले में सबसे पहले कुल्फी बेचकर गुजारा किया। दो साल बाद मामा नोतनदास देवली कैंप ले गए। यहां भी पहाड़ों जाकर लकड़ियां बीनीं। उन्हें बेचकर अनाज की व्यवस्था कर लेते थे। 1950 में पूरी देवली कैंप से 10 ट्रेनों से करीब 12 हजार लोग भोपाल आ गए। यहां बैरागढ़ में द्वितीय विश्व युद्ध के कैदियों की बैरकों में हमें जगह दी गई।

शुरुआत में उज्जैन-भोपाल की लोकल ट्रेनों में दालचूरा और मूंगफली तक बेची। लेकिन अपने एक साथ भोजोमल छुगानी की ट्रेन हादसे में एक पैर कटने की घटना के बाद मां गंगा देवी ने मुझे ट्रेन में नहीं जाने दिया। पाकिस्तान में मैंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी, इसके बाद 1953 में हम गांधीनगर में आगे की पढ़ाई दोबारा शुरू की। और फिर में बीए, एमए और बीएड कर लिया। 1957 में हायर सेकेंडरी करने के बाद टीचिंग शुरू की। 1958 में सांख्यिकी विभाग में नौकरी लग गई। RSS में सक्रियता के कारण नौकरी छूट गई।

सिंधी समाज शिक्षा में न पिछड़ जाए, इसलिए गेहाणी 7 से ज्यादा स्कूल शुरू करा चुके हैं।

सिंधी समाज शिक्षा में न पिछड़ जाए, इसलिए गेहाणी 7 से ज्यादा स्कूल शुरू करा चुके हैं।

इसके बाद ड्रायक्लीनिंग का कारोबार किया। इसके बाद साल 1966 में शैक्षणिक संस्था नवयुवक सभा से जुड़े। सिंधी समाज के बच्चे शिक्षित बनें, इसे देखते हुए 1970 से स्कूल खुलवाने शुरू किए। बैरागढ़ के नवयुवक सभा स्कूल में ही सबसे पहले प्रधान अध्यापक बने, फिर प्राचार्य की जिम्मेदारी भी संभाली। इसके बाद एटी शाहनी, केटी शाहनी और सिंधु मिडिल स्कूल खोला। फिर दीनदयाल कॉलेज खोला गया। गांधीनगर के लक्ष्मीदेवी विक्योमल सराफा विद्यालय में की जिम्मेदारी लगातार 10 साल तक संभाली।

अब तक चार स्कूलों में बतौर प्राचार्य अपनी सेवाएं दे चुके गेहाणी वर्तमान में सुधारसभा द्वारा संचालित साधु वासवानी स्कूल के प्रशासक हैं। गेहाणी बताते हैं कि पाकिस्तान छूटने के साथ ही सिंध के धार्मिक स्थल, साहित्य, भाषा जो सिंधी सभ्यता के बड़े स्तंभ थे, सब छूट गए। इसका बेहद अफसोस है। वे कहते हैं कि सिंधी समाज ने जितना भुगता है, किसी ने नहीं भुगता। दुख सिर्फ इस बात का है कि सिंध प्रांत छोड़ने के बाद समाज के लोगों को भारत में नया प्रांत मिलना तो दूर एक छोटा सा जिला भी नहीं दिया गया। सरकार को चाहिए कि मालिकाना हक देकर समाज के लोगों को अल्पसंख्यक घोषित करे।

75 साल में सब खत्म हो गया…लोगों की मदद के भरोसे हैं कमला शर्मा
पाकिस्तान से भारत आने तक का सफर काफी मुसीबतों भरा था। अलग-अलग कैंपों में होते हुए जब भोपाल के रिफ्यूजी कैंप लाए गए, उस वक्त मैं एक साल की थी। पिता कुंदनलाल ने शुरुआती दिनों में मेहनत-मजदूरी करके गुजर-बसर की। कुछ साल बीतने के बाद उन्होंने शर्मा भोजनालय खोला। फिर धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर आने लगी थी। इटारसी में मेरा रिश्ता हुआ था, लेकिन शादी ज्यादा समय नहीं चल सकी।

परिवार में अकेली बचीं कमला शर्मा को आसपास के लोग मानसिक रोगी कहने लगे हैं।

परिवार में अकेली बचीं कमला शर्मा को आसपास के लोग मानसिक रोगी कहने लगे हैं।

एक साल बाद पति की प्रताड़ना के कारण मैं अपने मायके आ गई और फिर दोबारा नहीं गई। शादी से पहले माता-पिता के पास बहुत सुखी थी। पिताजी कमाने के लिए दिन-रात लगे रहते थे। उन्होंने हमें कभी परेशान नहीं होने दिया। साल दर साल गुजरते गए और मेरी जिंदगी पहले एकांत में घिरी, फिर मेरे नाम के साथ मानसिक रोगी जुड़ गया। आसपास के लोग मानसिक रोगी कहते हैं। 75 साल में सब कुछ खत्म हो गया, अब तो बस लोगों की मदद पर ही जीवन चल रहा है। जो मिल जाता है खाकर गुजर-बसर कर रहीं हूं।

घर के मालिकाना हक के लिए संघर्ष कर रहे परमानंद दादलानी
60 साल के परमानंद दादलानी 15 साल से अपने मकानों का मालिकाना हक के लिए शासन-प्रशासन से लड़ाई लड़ रहे हैं। बैनर्जी-इसरानी मार्केट में रिफ्यूजी कैंप में आए लोगों के लिए बनाए गए मकानों में रहने वाले दादलानी के घर में पत्नी के अलावा उनका दूसरा कोई नहीं है। 17 साल पहले माता-पिता के निधन के बाद से वह रिफ्यूजियों को उनका हक दिलाने में लगे हुए हैं। दादलानी बताते हैं कि पाकिस्तान से आने वालों के मुश्किल दिनों के कई किस्से उन्होंने बुजुर्गों से सुने हैं।

दादलानी का कहना है कि वे घर का मालिकाना हक दिलाने के लिए लड़ते रहेंगे।

दादलानी का कहना है कि वे घर का मालिकाना हक दिलाने के लिए लड़ते रहेंगे।

सिंध से जुड़ी यादों के नाम पर उनके पास सिर्फ अपने माता-पिता की तस्वीर भर है। जिसे देखकर वे आज भी उस दौर को याद करने लगते हैं। दादलानी के संघर्ष की शुरुआत में उन्होंने सबसे पहले 2006 में पट्‌टे दिए जाने की मांग उठाई थी। इसके बाद नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर, अपर कलेक्टर दीपक सक्सेना के अलावा कलेक्टर निशांत वरवड़े और सुदान खाड़े को भी को 2 बार ज्ञापन दे चुके हैं। खुद CM शिवराज सिंह चौहान के सामने तो वे तीन बार अपनी मांग लिखित में सामने रख चुके हैं। लेकिन हर बार उन्हें आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला।

बुजुर्गों से सुने किस्सों को जब भी वे याद करते हैं तो उन्हें लगता है 74 साल में पाकिस्तान से आने वालों को मालिकाना हक तक नहीं मिल पाया है। दादलानी का कहना है कि अपनी आखिरी सांस तक अपनों को उनके घर का मालिकाना हक दिलाने के लिए लड़ते रहेंगे।

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